डिंडोरी-:आई विटनेस न्यूज24, पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जीवन नई पीढ़ी के लिए किसी किताब से कम नहीं है। शास्त्री जी ने सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता के जो प्रतिमान स्थापित किए वह कम ही दिखते हैं।
चाहे साल 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध में उनके नेतृत्व की बात हो या फिर रेल दुर्घटना के बाद उनका रेल मंत्री के पद से इस्तीफा लाल बहादुर शास्त्री ने सार्वजनिक जीवन में श्रेष्ठता के जो प्रतिमान स्थापित किए उसके बहुत कम उदाहरण आज दिखाई देते हैं। आधुनिक भारत के इतिहास पर नजर डालें तो शास्त्रीजी की पूरी जिंदगी ही सादगी और ईमानदारी की मिसाल थी।
लौटा दी थी आर्थिक मदद -
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान का एक वाकया सामने आता है। उस वक्त लाला लाजपतराय ने सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी की स्थापना की थी जो आजादी की लड़ाई लड़ रहे गरीब नेताओं को आर्थिक सहायता प्रदान करती थी। सोसाइटी शास्त्री जी को भी घर का खर्चा चलाने के लिए हर महीने 50 रुपये देती थी। उन्होंने एक बार जेल से पत्नी ललिता को पत्र लिखकर पूछा था कि क्या सोसाइटी की ओर से जो 50 रुपये दिए जाते हैं, वे काफी हैं। जवाब में ललिता जी की ओर से बताया गया कि 40 रुपये में ही घर का गुजारा हो जा रहा है। इसके बाद शास्त्री जी ने सोसाइटी को पत्र लिखकर कहा कि चूंकि मेरे परिवार का गुजारा 40 रुपये में हो जा रहा है, इसलिए मेरी आर्थिक मदद घटाकर 40 रुपये कर दी जाए।
सरकारी गाड़ी का नहीं करते थे इस्तेमाल -
लाल बहादुर शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री की किताब “लाल बहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी” में एक रोचक प्रसंग में कहा है कि शास्त्री जी जब 1964 में प्रधानमंत्री बने, तब उन्हें सरकारी आवास के साथ ही इंपाला शेवरले कार मिली, जिसका उपयोग वह न के बराबर ही करते थे। वह गाड़ी किसी राजकीय अतिथि के आने पर ही निकाली जाती थी। एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी। शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई? और जब ड्राइवर ने बताया कि 14 किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया कि लिख दो, 14 किलोमीटर निजी उपयोग। शास्त्री जी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें।
एक वाकया और है कि शास्त्री जी के प्रधानमंत्री बनने तक ना तो उनके पास अपना घर था ना ही कोई कार। एक बार जब बच्चों ने उलाहना दिया कि आप देश के प्रधानमंत्री है, अपनी कार तो होनी चाहिए। उस समय एक फिएट कार की कीमत 12,000 रुपये होती थी। शास्त्री जी के खाते में केवल 7,000 रुपये थे और उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5,000 रुपये लोन लेकर कार खरीदी थी।
पत्नी ललिता शास्त्री का स्वाभिमान भी बेमिसाल
कहते हैं कि इस घटना के एक साल बाद ही कार का लोन चुकाने से पहले उनका निधन हो गया था। इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं और उन्होंने लोन माफ करने की पेशकश की थी लेकिन पत्नी ललिता शास्त्री जी ने इसे स्वीकार नहीं किया। उन्होंने शास्त्री जी की मौत के चार साल बाद अपनी पेंशन से वह लोन चुकाया था। जानते हैं यह कार अभी भी है। दिल्ली के लाल बहादुर शास्त्री मेमोरियल में इसे रखा गया है। दूर-दूर से लोग इसे देखने के लिए आते हैं।
एक और वाकया उनकी सादगी की मिसाल पेश करता है। कहते हैं एक बार शास्त्री जी के घर पर सरकारी विभाग की तरफ से कूलर लगवाया गया। जब इसकी खबर उन्हें लगी तो इसे निकलवाने का आदेश दिया। उन्होंने कहा, इससे आदत बिगड़ जाएगी।
मुफ्त की चीजें पसंद नहीं -
एक ओर जहां आज के नेताओं के पास तोहफों की भरमार होती है वहीं शास्त्री जी मुफ्त की चीजें पसंद नहीं करते थे। कहा जाता है कि प्रधानमंत्री बनने के बाद शास्त्रीजी एक बार पत्नी के लिए साड़ी खरीदने गए थे। मिल मालिक की ओर से उनको कुछ महंगी साड़ियां दिखाई गईं तो उन्होंने जवाब दिया था कि इतनी महंगी साडियां खरीदने लायक उनके पास पैसे नहीं हैं। इसके बाद मिल मालिक ने साड़ी गिफ्ट करनी चाही तो उन्होंने मना कर दिया था।
खुद रखा व्रत तब की देशवासियों से उपवास की अपील
मौजूदा वक्त में नेता जहां पर उपदेश कुशल बहुतेरे की लीक पर चलते हैं। शास्त्री जी पहले खुद और परिवार को आदेशों का पालन कराते थे और तब लोगों से ऐसा करने की अपील करते थे। जब देश में अकाल की समस्या आई तब शास्त्रीजी ने देशवासियों से एक दिन का व्रत करने की अपील की थी। तब शास्त्रीजी खुद नियमित व्रत रखते थे और परिवार को भी ऐसा ही करने का निर्देश था।
आज उनकी पुण्यतिथि है।
"जय जवान, जय किसान" के प्रणेता, सादगी, कर्मठता और जन-सेवा के प्रतीक पुरुष भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि
