आई विटनेस न्यूज 24, शनिवार 2 मई, आम नागरिकों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर से राहत दिलाने के उद्देश्य से शुरू की गई सीएम हेल्पलाइन 181 अब खुद ही सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि इस हेल्पलाइन के जरिए शिकायतों का समाधान करने के बजाय उन्हें कागजों में निपटाने का खेल चल रहा है, जिसमें जिम्मेदार अधिकारी खुलकर मनमानी कर रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि उनकी समस्याएं ज्यों की त्यों बनी हुई हैं, लेकिन सिस्टम में उन्हें “निराकृत” दिखाकर फाइलें बंद कर दी जाती हैं। एल-3 और एल-4 स्तर के अधिकारी तक झूठी जानकारी फीड कर शिकायतों को खत्म करने में लगे हैं। इससे न केवल आम जनता का भरोसा टूट रहा है, बल्कि पूरे तंत्र की पारदर्शिता पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
मामले की एक बानगी जिला चिकित्सालय से सामने आई है, जहां फिजियोथेरेपी विभाग महज खानापूर्ति बनकर रह गया है। आरोप है कि मरीजों को उपचार देने के बजाय फिजियोथेरेपिस्ट अपने निजी सेंटर का कार्ड थमाकर वहां आने की सलाह दे रही हैं। जब इस संबंध में शिकायत सीएम हेल्पलाइन 181 पर दर्ज कराई गई, तो उसे भी दबाने की कोशिश की गई।
शिकायतकर्ता के अनुसार, जिला चिकित्सालय के हेल्पलाइन प्रभारी ने फोन पर बात तो की, लेकिन अपना नाम और पद बताने से इनकार कर दिया। यही नहीं, बिना वास्तविक समाधान के शिकायत को बंद करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि अस्पताल प्रशासन ने अपने जवाब में फिजियोथेरेपिस्ट का बचाव करते हुए दावा किया कि मरीज को उपलब्ध मशीन से इलाज दिया गया और किसी निजी सेंटर के लिए नहीं कहा गया। जबकि शिकायतकर्ता इसे पूरी तरह झूठा बता रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि जब अस्पताल में आवश्यक मशीनें ही उपलब्ध नहीं हैं, तो फिजियोथेरेपी जैसी सेवा केवल दिखावे के लिए क्यों चलाई जा रही है? क्या सरकारी वेतन पर निजी क्लीनिक के लिए ग्राहक जुटाना ही इनका असली काम बन गया है?
इस पूरे मामले ने न केवल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल दी है, बल्कि सीएम हेल्पलाइन 181 की कार्यप्रणाली को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। यदि जिला मुख्यालय स्तर पर ही इस तरह की लापरवाही और लीपापोती हो रही है, तो ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।
फिलहाल, जिम्मेदार अधिकारी चुप्पी साधे हुए हैं और शिकायतकर्ता न्याय की आस में भटक रहा है। सवाल यही है—क्या जनता की आवाज उठाने के लिए बनी हेल्पलाइन अब सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गई है?

