राजेन्द्र तंतवाय की रिपोर्ट
आई विटनेस न्यूज 24, शुक्रवार 1 मई, आदिवासी बाहुल्य जिले डिंडोरी में कानून व्यवस्था को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि “कानून सबके लिए समान है” जैसे मूल सिद्धांत को भी कटघरे में ला खड़ा किया है।
शाहपुर थाना क्षेत्र में इन दिनों पुलिस की सख्ती चरम पर है। जगह-जगह चेकिंग पॉइंट लगाकर दोपहिया और चारपहिया वाहनों की जांच की जा रही है। हेलमेट, ड्राइविंग लाइसेंस, बीमा, आरसी और खास तौर पर नंबर प्लेट को लेकर सख्त कार्रवाई की जा रही है। मामूली कमी पर भी चालान ठोककर नियमों का हवाला दिया जा रहा है।
लेकिन इसी सख्ती के बीच एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने पूरी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार, शाहपुर थाना प्रभारी केवल सिंह परते के सरकारी वाहन में आगे नंबर प्लेट तो लगी हुई है, लेकिन पीछे की नंबर प्लेट लंबे समय से गायब है।
क्या कहते हैं नियम?
मोटर वाहन अधिनियम और केंद्रीय मोटर वाहन नियम स्पष्ट रूप से कहते हैं कि—
हर वाहन में आगे और पीछे दोनों तरफ नंबर प्लेट होना अनिवार्य है।
नंबर प्लेट निर्धारित मानकों (HSRP) के अनुसार होनी चाहिए।
उल्लंघन की स्थिति में जुर्माना और कानूनी कार्रवाई तय है।
यानी जो नियम आम जनता पर पूरी सख्ती से लागू किए जा रहे हैं, वही नियम जिम्मेदार अधिकारी के वाहन पर लागू होते नहीं दिख रहे।
यह पूरा मामला एक गंभीर सवाल खड़ा करता है—क्या कानून केवल आम नागरिकों के लिए ही है? क्या वर्दी पहनते ही नियमों से छूट मिल जाती है? यदि कोई आम व्यक्ति बिना नंबर प्लेट के वाहन चलाते हुए पकड़ा जाता, तो क्या उसे इतनी ही सहूलियत मिलती?
यह स्थिति न सिर्फ कानून की समानता को चुनौती देती है, बल्कि पुलिस की साख और विश्वसनीयता पर भी गहरा असर डालती है। जब कानून लागू करने वाले ही उसका पालन नहीं करेंगे, तो आमजन में कानून के प्रति सम्मान कैसे कायम रहेगा?
अब नजरें जिला प्रशासन और पुलिस के उच्च अधिकारियों पर टिकी हैं। क्या इस स्पष्ट नियम उल्लंघन पर संज्ञान लिया जाएगा? क्या संबंधित अधिकारी पर वैसी ही कार्रवाई होगी जैसी आम जनता पर होती है? या फिर यह मामला भी ‘वर्दी की आड़’ में दबकर रह जाएगा?
यह घटना केवल एक नंबर प्लेट की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की कहानी है, जहां नियम बनते तो सबके लिए हैं, लेकिन लागू कुछ पर ही होते हैं। यदि समय रहते इस पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संदेश साफ जाएगा कि कानून की सख्ती सिर्फ आमजन के लिए है, जिम्मेदारों के लिए नहीं।

