आई विटनेस न्यूज 24, सोमवार 4 मई, क्या डिण्डोरी जिला प्रशासन ने फर्जीवाड़े से कोई सबक नहीं सीखा है? जिस जिले के सरकारी रेस्ट हाउस में महीनों तक एक फर्जी 'अपर कलेक्टर' रुककर व्यवस्था को ठेंगा दिखा चुका हो और हॉस्टलों की फर्जी चेकिंग कर चुका हों, वहाँ अब सड़क पर सरेआम वाहन चैकिग 'प्राइवेट प्यादे' का नया अध्याय लिखा जा रहा है। आरटीओ विभाग के तमगे के पीछे छिपे निजी चेहरों ने प्रशासन की साख को चौराहे पर नीलाम कर दिया है।
नियम कहता है कि वाहन चेकिंग के दौरान आरटीओ अधिकारी ( खाकी शर्ट, पैंट, काली बेल्ट और काली टोपी पुलिस के समान वर्दी) उड़नदस्ता और वरिष्ठ कर्मचारियों के लिए वाहन चेकिंग के दौरान वर्दी पहनना अनिवार्य किया गया है,नियम 21 अप्रैल 2025 से प्रभावी हो गए हैं व पुलिसकर्मी का पूरी वर्दी और नेम प्लेट के साथ होना अनिवार्य है। साथ ही अवैध वसूली रोकने के लिए अधिकारियों को जांच के दौरान बॉडी वार्न कैमरे और पीओएस मशीन का उपयोग करना अनिवार्य है।
लेकिन डिण्डोरी की सड़कों पर नियम केवल किताबों तक सीमित हैं। वायरल तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि वर्दीधारी अधिकारी मौके से नदारद हैं और पंकज डहेरिया जैसे गैर-शासकीय व्यक्ति, जिनका विभाग से कोई लेना-देना नहीं है, वाहनों को रोककर दस्तावेजों की जांच कर रहे हैं।
यह मामला सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है।
सूत्रों और मीडिया को उपलब्ध कराई गई तस्वीरों के अनुसार, यह गैर-शासकीय व्यक्ति अक्सर कलेक्टर की महत्वपूर्ण बैठकों में भी नजर आता है। हद तो तब हो गई जब जनसंपर्क विभाग (PRO) ने खुद इस अवैध चेकिंग की तस्वीरें गर्व के साथ मीडिया को जारी कीं। सवाल यह है कि क्या प्रशासन ने एक निजी व्यक्ति को जिले का 'सुपर आरटीओ' घोषित कर दिया है?
पूर्व आरटीओ अधिकारी से इस गैर शासकीय कर्मचारी के विषय मे पूछा गया कि पंकज डहेरिया इस कार्यालय में किस पद पर किस हैसियत से कार्यालयीन कार्यो को कर रहा है तो उन्होंने ने भी दबी जुबान में स्वीकार किया था कि निजी व्यक्तियों से कार्यालयीन कार्य व चेकिंग कराना गलत है, लेकिन इसे सुधारने के बजाय बढ़ावा दिया गया। बड़ा सवाल ये है कि जब 'स्मार्ट चिप' कंपनी का अनुबंध खत्म हो चुका है, तो पंकज डहेरिया किस हैसियत से सरकारी कार्य कर रहा है?
क्या विभाग को किसी बड़े हादसे या फर्जीवाड़े का इंतजार है, जैसा 'फर्जी अपर कलेक्टर' के समय हुआ था?
हाईवे पर बिना बैरिकेडिंग और बिना अधिकारी के गाड़ियाँ रुकवाना क्या जानलेवा लापरवाही नहीं है?
हाईवे पर बिना सुरक्षा मानकों के अचानक गाड़ियाँ रुकवाना हादसों को दावत देना है। एक तरफ सरकार पारदर्शिता की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ डिण्डोरी का परिवहन विभाग 'प्राइवेट एजेंटों' के जरिए व्यवस्था चला रहा है। क्या जिले की पहचान अब इन अवैध कारनामों से ही होगी? यदि कोई अनधिकृत व्यक्ति गाड़ी रुकवाता है और कोई अनहोनी होती है, तो क्या आरटीओ साहब या डिण्डोरी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी इसकी जिम्मेदारी लेंगे?


