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भोपाल मध्य प्रदेश -विश्व – विख्यात उर्दू शायर डा.बशीर बद्र को मिली 48 साल बाद पीएचडी की डिग्री

डिंडौरी,आई विटनेस न्यूज 24, उर्दू के विश्व विख्यात शायर पद्मश्री डॉ. बशीर बद्र को पीएचडी के 48 साल बाद डिग्री मिली है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने उनकी उन्हें भेजी है. बशीर साहब ने 1973 में उर्दू में पीएचडी की थी, लेकिन, फिर शायरी की दुनिया में इतने मशगूल हो गए कि कभी उसे लेने नहीं गए. उनकी पत्नी डॉ. राहत बद्र ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को इसके लिए आवेदन भेजा था, जिसके बाद वहां से डिग्री भेज दी गई.
अगले महीने की 15 तारीख को जन्मदिन
अगले महीने की 15 तारीख को बशीर साहब का जन्मदिन भी है. लेकिन, उनकी तबियत इतनी नासाज है कि आज उनके अल्‍फ़ाज़ कहीं गुम हैं. ग़ज़ल जैसे उनकी ज़बां पर तो है मगर उसे ख़ामोशियां गुनगुना रही हैं. अब उनकी याददाश्त के धागे इतने कमजोर पड़ गए हैं कि ख़ुद उनकी ग़ज़ल भी उन्‍हें याद दिलाने से याद आती है. हालांकि इस तन्‍हा सफ़र में भी उनकी शरीके-हयात डॉ.राहत बद्र हर लम्‍हा उनके साथ हैं. वह उनकी ख़ामोशियों को इस तरह समझती हैं जैसे मुहब्‍बत की ग़ज़ल पर कोई धीमा-सा साज़ दे रहा हो.

बशीर बद्र साहब का सफरनामा

बशीर बद्र की पैदाइश अयोध्या में हुई. उनका बचपन कानपुर में बीता. उनकी तालीम अलीगढ़ में मुकम्मल हुई. वहीं मेरठ से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा है. शायद यही वजह है कि 1987 के साम्प्रदायिक दंगों में जब उनका आशियाना खाक हुआ, तो उसकी तपिश उनके जज्बात, एहसास तक भी पह़ंची. इसी पर उनका एक शेर बहुत मशहूर है कि ‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.’ हालांकि इसके बाद वह ज्यादा वक्त मेरठ में नहीं रहे और अपना ढाई कमरों का मकान छोड़ कर भोपाल में बस गए. ‘दुश्मनी जम के करो लेकिन यह गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों.’ उनका यह शेर इतना मशहूर हुआ कि अक्‍सर सियासत के गलियारों में इसकी गूंज सुनाई देती है।

Ashish Joshi

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ASHISH JOSHI | आई विटनेस न्यूज़ 24 के संचालक के रूप में, मेरी प्रतिबद्धता हमारे दर्शकों को सटीक, प्रभावशाली और समय पर समाचार प्रदान करने की है। मैं पत्रकारिता की गरिमा को बनाए रखते हुए हर खबर को सच के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ। आई विटनेस न्यूज़ 24 में, हमारा लक्ष्य है कि हम समाज को सशक्त और जोड़ने वाली आवाज़ बनें।